Friday, November 20, 2009

अभिलाषा


"अभिलाषा"


अभिलाषा छलs हमर एक ,
करितौंह हम धिया सँ स्नेह ।
हुनक नखरा पूरा करय मे ,
रहितौंह हम तत्पर सदिखन ।
सोचैत छलहुँ हम दिन राति ,
की परिछ्ब जमाय लगायब सचार ।
धीया तs होइत छथि नैहरक श्रृंगार ,
हँसैत धीया रोएत देखब हम कोना ।
कोना निहारब हम सून घर ,
बाट ताकब हम कोना पाबनि दिन ।
सोचैत छलहुँ जे सभ सपना अछि ,
ओ सभ आजु पूरा भs गेल।
घर मे आबि तs गेलिह धीया ,
बिदा नहि केलहुँ , नय सुन अछि घर ।
एक मात्र कमी रहि गेल ,
सचार लगायल नहिये भेल।।


-कुसुम ठाकुर -


Thursday, November 19, 2009

हमर पहिल मैथिली कविता

"चुल बुली कन्या बनि गेलहुँ "


बिसरल छलहुँ हम कतेक बरिस सँ ,
अपन सभ अरमान आ सपना ।
कोना लोक हँसय कोना हँसाबय ,
आ कि हँसी में सामिल होमय ।
आइ अकस्मात अपन बदलल ,
स्वभाव देखि हम स्वयं अचंभित ।
दिन भरि हम सोचिते रहि गेलहुँ ,
मुदा जवाब हमरा नहि भेंटल ।
एक दिन हम छलहुँ हेरायल ,
ध्यान कतय छल से नहि जानि ।
अकस्मात मोन भेल प्रफुल्लित ,
सोचि आयल हमर मुँह पर मुस्की ।
हम बुझि गेलहुँ आजु कियैक ,
हमर स्वभाव एतेक बदलि गेल ।
किन्कहु पर विश्वास एतेक जे ,
फेर सँ चंचल , चुलबुली कन्या बनि गेलहुँ ।।


- कुसुम ठाकुर -


Tuesday, November 10, 2009

एक विलक्षण प्रतिभा जिनका हम सदिखन याद करैत छी (चौबीसम कड़ी)

लल्लन जी हमरा सs किछु नहि नुकाबय छलाह आ नहि हम हुनका कोनो काज में बाधा दियैन्ह आ कि मना करियैन्ह। हुनका मोन में अपन माँ पिता जी भाई बहिन के प्रति अपार स्नेह छलैन्ह । माँ केर तs ओ परम भक्त छलाह , माँ किछु कहि देथिन्ह तs हुनकर प्रयास रहैत छलैन्ह जे ओ ओकरा अवश्य पूरा करैथ मुदा एहेन विडम्बना जे हुनकर बीमारी के विषय में हम माँ के नहि कहि सकलियैन्ह। माँ के मात्र एतवा बुझल छलैन्ह जे लल्लन जी केर बेर बेर बुखार भs जाइत छैन्ह ।

मनुष्य जखैन्ह दुःख में रहैत अछि तs ओकरा भगवान छोरि और किछु मोन नहि रहैत छैक । ओ अपन दुःख में ततेक नहि ओझरायल रहैत छैक जे आन किछु सोचबाक ओकरा फुर्सत नहि भेंटैत छैक । लल्लन जी सन व्यक्तित्व केर बाते किछु आओर होइत छैक । अपने बीमार छलाह मुदा दोसर केर विषय में सदिखैन सोचैत रहैत छलाह । कखनहु कs हुनक एहि तरहक सोच देखि हमहु बिसरि जायत छलहुँ जे ओ बीमार छथि मुदा एहेन कोनो दिन नहि होइत छलैक जे हम राति में हुनका विषय में नहि सोचैत छलहुँ । हमर तs जेना नींद उरि गेल छल , राति या तs टक टकी लगा कs बितैत छल या नहि तs नोर बहा कs । दोसर तरफ़ मुँह कs हम भरि राति कानैत रहि जाइत छलहुँ। एक तs लल्लन जी बीमार छलाह दोसर हम एहि विषय में किनको सs नहि कहने रहियैन्ह आ नहि हम ओकर चर्च करैत छलहुँ खास कs बच्चा सब लग तs एकदम नहि । सब सs कष्टप्रद छलs जे हमरा दुनु गोटे के सबटा बुझल छल मुदा हम सब एक दुसरा संग सेहो कखनो एहि विषय पर गप्प नहीं करैत छलियैक । की गप्प करितियैक , कोना करितियैक मुदा एक दिन लल्लन जी केर मुँह सs निकलिए गेलैन्ह आ हमरा पुछि देलाह ।


हमरा ओहिना मोन अछि, हमर मंगल व्रत छल साँझ में खेलाक बाद हमर माथ घुमय छल हम बिछौना पर आबि कs परल रही लल्लन जी टीवी देखय छलाह किछुए समय बाद ओहो आबि कs हमरा बगल में परि रहलाह । इ देखि पता नहि हमर मोन आओर बेचैन भs गेल हम मुँह झाँपि कs दोसर दिस घुमि गेलहुँ । ओहि घर में मात्र हम दुनु गोटे छलहुँ । अचानक लल्लन जीक आवाज कान में आयल "किछु होइत अछि की , आकि फेर माथ घूमि रहल अछि" । हम किछु नहि बजलियैन्ह , हम ऐना परल छलहुँ जेना हम सुतल रहि , मुदा ओ तs हमर एक एक टा मोनक गप्प बुझैत छलाह तुरन्त कहलाह हम सब बुझैत छी अहाँक मोनक गप्प , मुदा हमरा बाद अहाँ की करब"? बस एतबहि बजलाह आ चुप भs गेलाह । इ सुनतहि हमर माथ जेना सुन्न भs गेल , हमरा किछु नहि फुरायल नहि किछु बाजि भेल मुदा हमर आँखि सs नोर ढब ढब खसय लागल आ ओ रुकय के नाम नहि लैत छल । ओहि राति हम पहिल बेर लल्लन जी के सोंझाँ में हुनका बीमार भेलाक बाद कानल छलहुँ आ भरि राति कानैत रहि गेलहुँ । लल्लन जी केर सेहो एतबा हिम्मत नहि छलैन्ह जे हमरा चुप्प करबितथि ।
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