Friday, August 9, 2013

हे चन्दा आय बिसरल किया बेर




(आजु हमर पोता दर्श के जन्मदिन छैन्ह .......हुनका चन्दा मामा वाला गीत सब बड़ पसिंद पडैत छैन्ह ................कतबो कानैत  रहैत छथि गाना सुनतहि चुप्प भs जायत छथि .ई चन्दा मामा केर गीत हुनके लेल हुनकर पहिल जन्मदिन पर।)

हे चन्दा आय बिसरल किया बेर"

हे चन्दा आय बिसरल किया बेर, हे चन्दा केलहुं बहुत अबेर
बौआ हमर बाट तकैत छथि 
नहि बुझियौ आब सबेर 
हे चन्दा ....................

छवि हुनके मुखचन्द्र समायल, जे हमरो छथि बिसेस 
हे चन्दा, उतरू जाहि छी भेष, 
हे चन्दा कानल बौआ अनेर, 
हे चन्दा….................

चन्दा मामा दूर रहथि किया, कहथि ओ हमरा घेरि 
नहि जायथि हमरा छोरि 
जा कहियौन नहि करथि ओ देर
हे चन्दा........................

रुसल दर्श हम कोना मनायब, कहियौ नहि एक बेर 
हे चन्दा, नहि हँसथि छथि मुंह फेर 
हे उगियौ हेतय आब सबेर 
हे चन्दा...............................

कान्ह भिजल आ मोन बेकल अछि, नहि देखैत छथि एको बेर
हे कहथि, दाइ नहि किछुओ लेब
नहि मानथि मामा के बेर
हे चन्दा ................................

-कुसुम ठाकुर-


http://www.youtube.com/watch?v=VdYgbcjRO_k&feature=youtu.be

Friday, July 19, 2013

जन्म भूमि आय मोन परल

(अमेरिका प्रवास के दौरान पहिल बेर जहिया हम सुनहुं जे ओहि ठाम लोक के अपन कब्र के लेल सेहो स्वयं पाई जमा करय परैत छैक तs  कैक  दिन तक हम ओहि विषय में  सोचैत रहि गेलहुँ  . इ कविता ओहि सोच केर उपज अछि. इ कविता हम अप्रवासी भारतीय के ध्यान में राखैत लिखने छी. कविता के माध्यम सs हम ओहि अप्रवासी भारतीय के मनोदशा के कहय चाहैत छियैक जे स्वदेश वापस लौटय चाहय छथि मुदा किछु परिस्थिति वश नहि लौट सकैत छथि।)

"जन्म भूमि आय मोन परल"

जन्म भूमि आय मोन परल, कोना वापस जाई नोर खसल

कही कोना अछि ह्रदय समायल 
मजबूरी किछु सुझि नहीं पायल
मुदा आय फिसलि यदि  जायब
खसलहुं तs  फेर उठि नहि पायब
जन्म भूमि आय मोन परल, कोना वापस जाई नोर खसल

मजबूरी, वश छोरय परल छल 
चकाचौंध तs  सते बहुत छल
मुदा आब हम मझधार में छी
एक  दिस खद्धा दोसर दिस मौत
जन्म भूमि आय मोन परल, कोना वापस जाई नोर खसल

बचेने रही धरोहर में छोरब
मुदा कफ़न अपन सेहो जोरब
गज भरि जमीन ज्यों ओहि ठाम मांगी
मुमकिन जौं होइत कहितहुँ ठानि
जन्म भूमि आय मोन परल, कोना वापस जाई नोर खसल

सांस बसल अछि जाहि जमीन पर
अँखि जौं मुनि तs तृप्त गंगा जल पर
संभव की होयत से तs  नहि जानि
ली जनम फेर ओहि जमीन पर, तैं
जन्म भूमि आय मोन परल, कोना वापस जाई नोर खसल

-कुसुम ठाकुर-

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